समकालीन हिंदी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह का 19 मार्च (सोमवार) को नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन हो गया. वे 83 वर्ष के थे. कुछ दिनों से निमोनिया से पीड़ित होने के कारण एम्स में उनका इलाज़ हो रहा था.
अज्ञेय द्वारा प्रकाशित ‘तीसरा सप्तक’ (1959) से लेकर अब तक उनका साहित्यिक जीवन काफी लंबा और समृद्ध रहा है. काव्य और गद्य रचना के अतिरिक्त हिंदी कविता के अध्यापक के रूप में भी उनकी ख्याति रही है. वे जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा केंद्र से हिंदी के प्रोफेसर के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद से स्वतंत्र लेखन कर रहे थे.
साहित्य अकादमी, भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार, व्यास सम्मान जैसे पुरस्कारों से सम्मानित केदारनाथ सिंह ने 2010 में दिल्ली सरकार का शलाका सम्मान ठुकरा कर यह प्रमाणित किया कि एक सच्चे साहित्यकार के लिए साहित्यिक शुचिता किसी भी सम्मान या अर्थलाभ से ज्यादा महत्वपूर्ण होती है. उल्लेखनीय है कि तब शलाका सम्मान समिति ने कृष्ण बलदेव वैद का नाम पुरस्कार के लिए घोषित कर बाद में अपना निर्णय बदल दिया था. केदारनाथ सिंह ने इसी बात पर नाराज होकर शलाका सम्मान ठुकरा दिया था.
अकाल में सारस, बाघ, उत्तर कबीर, अभी बिलकुल अभी तथा यहाँ से देखो उनके चर्चित कविता संग्रह हैं.

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