स्वतंत्रता के पश्चात राजनीति को आधार बनाकर लिखे गये उपन्यासों में मैला आंचल, रागदरबारी और महाभोज सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं। मन्नू भण्डारी का महाभोज, प्रेमचन्द का ‘गोदान’ और फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’ तीनों ही मोहभंग जनित परिस्थितियों की उपज हैं। प्रेमचन्द के मोहभंग का कारण तत्कालीन स्वाधीनता आन्दोलन का सामन्ती चरित्र था तो रेणु के मोहभंग का कारण आजादी से जुड़ी आशाओं-आकांक्षाओं का खण्डित होना था। लोगों ने जयप्रकाश नारायण के सम्पूर्ण क्रांति आन्दोलन से बड़ी उम्मीदें लगा रखी थीं।

उम्मीद थी कि सत्ता का चेहरा बदलेगा, शोषण और भ्रष्टाचार का निरंकुश रथ थमेगा, लेकिन चन्द ही दिनों में ये सारी उम्मीदें धूल धूसरित हो गयीं। लोगों ने देखा कि नयी व्यवस्था में न चेहरे बदले और न उनका वास्तविक चरित्र। शोषण और भ्रष्टाचार का रथ द्विगुणीत रफ्तार से चलता रहा। यही मोहभंग ‘महाभोज’ की आधार भूमि है। महाभोज का अर्थ है किसी की मृत्यु पर होने वाली दावत! यहाँ मृत्यु सिर्फ बिसू की ही नहीं होती, बल्कि लोकतन्त्र और उससे जुड़े सपनों की भी होती है। दावत उड़ाते हैं स्वार्थी और भ्रष्ट राजनीतिज्ञ, सत्ता के पिठ्ठू पुलिस वाले और सरकारी भोंपू बने मीडिया वाले। 

महाभोज उपन्यास बिहार में जनता पार्टी शासन के दौरान  हुए बेलछी नरसंहार से प्रेरित है। उल्लेखनीय है कि हरिजनों को जिन्दा जलाये जाने की यह घटना नागार्जुन के ‘हरिजन गाथा’ की भी प्रेरक है। चुनावी माहौल में हरिजनों को जलाया जाना और उसका विरोध करने बाले बिसू की हत्या राजनीतिक दलों को चुनावी दाँव पेंचो का अवसर प्रदान करती है। महाभोज में बिसू की मौत और उसके बाद की घटनाओं के माध्यम से लेखिका ने भ्रष्ट भारतीय राजनीति का नग्न यथार्थ प्रस्तुत किया है। 

सरोहा गांव यूँ तो राजधानी के निकट होते हुए भी विकास की किरणों से अछूता है। आम दिनों में चन्द हरिजनों के जलने या किसी एक व्यक्ति की हत्या से कोई हलचल नहीं मचनी थी, लेकिन यहाँ माहौल चुनाव का है और वह भी ऐसे चुनाव का जहां निवर्तमान मुख्यमंत्री सुकुल बाबू चुनाव लड़ रहे है। सुकुल बाबू स्वयं प्रत्याशी हैं, निश्चय ही यह सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न है। दोनों ही पक्ष इस मौके को अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करते हैं और इस क्रम में सत्तापरस्त मूल्यहीन राजनीति की कलई परत दर परत खुलकर सामने आती है। बिसू की मौत सुकुल बाबू के लिए ईश्वर प्रदत्त मौका है, जिसके जरिये वह अपनी चुनावी रोटियाँ सेंक सकते हैं। वह दा साहब और उनकी सरकार से बिसू की मौत का हिसाब माँगने सरोहा पहुंच जाते हैं। यद्यपि स्वयं उनके पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि उनकी सरकार ने चार साल तक बिसू को किस अपराध में जेल में रखा था। वस्तुतः सुकुल बाबू या दा साहब अन्तर सिर्फ उपरी है। उनेक वास्तविक चरित्रों में कोई भेद दिखाई नहीं पड़ता। दा साहब, सुकुल बाबू की अपेक्षा राजनीति के ज्यादा मंझे हुये खिलाड़ी है। भारतीय राजनीति के सिद्धान्त और व्यवहार, कथनी और करनी के अन्तर को दा साहब के चरित्र के माध्यम से समझा जा सकता है। दा साहब ने आदर्शवाद, नैतिकता, अध्यात्म जैसे कई नकाब अपने वास्तविक चेहरे पर चढ़ा रखे हैं। उनका वास्तविक चेहरा है एक मौका परस्त ढोंगी और राजनीतिक दाँव पेचों में माहिर कुटिल राजनीतिज्ञ का। दा साहब के पास सुकुल बाबू की हर चाल की काट है। राजनीति की बिसात पर किस मोहरे को कब कहां रखना है और कब अचानक शह देकर प्रतिद्वन्दी को मात कर देना है यह दा साहब को अच्छी तरह आता है। बात-बात पर गीता के उदाहरण देने वाले और नैतिक मूल्यों की बात करने वाले दा साहब का यह रूप भोली भाली जनता को मूर्ख बनाने के लिए रचे गये एक ढ़ोंग से कुछ ज्यादा नहीं है- “धोती के नीचे भी धोती ही निकलेगी इस गीता बाँचने वाले की।” 

दा साहब अपना उल्लू सीधा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते है। जोरावर को जेल जाने से बचाकर वे न सिर्फ उसकी जाति के वोटों पर अपनी पकड़ बरकरार रखते है बल्कि गांव में सबसे पहले बिसू के घर जाकर, उसके पिता हीरा को अपने साथ मंच पर बिठाकर और हीरा के द्वारा अपनी घरेलू उद्योग योजना का उद्घाटन करवाकर शेष ग्रामीणों के वोट को भी अपने पक्ष में करने में कामयाब होते हैं। इन तिकड़मों के बाद भी अगर कोई विरोधी बचा तो उसे बूथ तक पहुँचने से रोकने के लिए जोरावर के लठैत तो हैं ही। 

आज की राजनीति की मौकापरस्ती, मूल्यहीनता और जनविरोधी चरित्र का कच्चा चिट्ठा है महाभोज। इस राजनीति में लोचन बाबू के आदर्शवाद की कोई कीमत नहीं है। उन्हें उसी प्रकार किनारे कर दिया जाता है जिस प्रकार मैला आंचल के बावनदास को। आज की राजनीति में कीमत है राव और चौधरी जैसे उन नेताओं की जो सत्ता के बाजार में खुद अपनी बोली लगाते है। ये ऐसे नेताओं की पौध हैं, जिनके लिए विचारधारा या मूल्य कोई मायने नहीं रखते। येन केन प्रकारेण कुर्सी की प्राप्ति ही इन नेताओं का चरम लक्ष्य है और यही आज का यथार्थ भी है।  

अब जरा मिडिया को देखें जनता के हक में आवाज बुलंद करना मीडिया का काम है। मीडिया को लोकतंत्र का निगहबान भी कहा जाता है, परन्तु आज के मीडिया के प्रतिनिधि है दत्ता साहब और उनका ‘मशाल,’ जिन्हें चंद विज्ञापनों और कागजों के कोटे के लिए सरकार का भोंपू बनने से कोई गुरेज नहीं होता। अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए वे पूरे अखबार को दा साहब के पास गिरवी रख देते हैं। मीडिया के सत्ता मुखापेक्षी होने का यह अच्छा उदाहरण है। दत्ता साहब का चरित्र वस्तुतः गोदान के ओंकारनाथ का ही ‘एक्सटेंशन’ है . 

तमाम सरकारी दावों और वादों के बावजूद भारत में जमींदारी का उन्मूलन सिर्फ कागजों पर हुआ है। गोदान के ‘राय साहब’ और मैला आंचल के विश्वनाथ प्रसाद की तरह महाभोज में भी गांव जोरावर जैसे लोगों की बपौती है। जोरावर सरोहा का स्वयंभू शासक है, जहां उसकी मर्जी के विरूद्ध कोई आवाज नहीं निकल सकती। गांव में किसी में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे जोरावर के विरोध में आवाज उठा सके। जो ऐसी कोशिश करते हैं, वे या तो जिन्दा जला दिये जाते हैं या बिसू की तरह मार दिये जाते हैं। यह सत्ता द्वारा संरक्षित सामंतवाद है। सत्ता चाहे किसी की भी हो, जोरावर जैसे लोग उसकी छाया सहज ही प्राप्त कर लेते हैं, क्योंकि उनके पास वोटों का बल है, नोटों का बल है और आज के समय में चुनाव जीतने के लिए ज़रूरी बाहुबल भी है। 

तमाम सरकारी घोषणाएँ और आंकड़े इस तथ्य को नहीं झुठला सकते कि आजादी के इतने सालों बाद भी भारतीय समाज में दलितों का शोषण और उत्पीडन बदस्तूर जारी है। वे जोरावर जैसे लोगों के सामने सीधे खड़े भी नहीं हो सकते। कोशिश की तो खामियाजा भुगतना पड़ेगा। जातिवाद का यह जहर भारतीय राजनीति की रगों में गहरे उतर चुका है। राजनीतिक दलों के लिए तथाकथित निम्न जातियाँ महज एक वोट बैंक हैं। 

राजनीति वर्तमान सन्दर्भो में मानव जीवन में केन्द्रीय भूमिका प्राप्त कर चुकी है। राजनीति किस प्रकार मनुष्य के आचार और व्यवहार का नियामक बन बैठी है हम मैला आंचल में देख चुके हैं। मन्नू भण्डारी ने ‘महाभोज’ में इसी राजनीति के दिनानुदिन भ्रष्ट और पतित होते जाने को इसके तमाम पक्षों के साथ चित्रित किया है। 

ऐसा नहीं है कि इस भ्रष्ट और अन्यायी राजनीतिक वयवस्था का कोई प्रतिरोध नहीं होगा। व्यवस्था चाहे कितनी भी शक्ति शाली और निरंकुश क्यों न हो एक सीमा के बाद उसके दमन और उत्पीड़न का विरोध होता ही है। शीकांत वर्मा ने ‘मगध’ में लिखा है- ‘मगध निवासियों कितना भी कतराओ तुम बच नहीं सकते हस्तक्षेप से क्योंकि जब तुम नहीं करोगे तो सड़क से गुजरता हुआ मुर्दा। यह प्रश्न उठा कर हस्तक्षेप कर सकता है कि मनुष्य क्यों मरता है?’’ वस्तुतः अन्यायी और उत्पीड़क व्यवस्था को बिना प्रतिरोध के सहन करने वाले लोग मुर्दे से भी गये बीते है। सरोहा गांव महाभोज में शोध करने आये महेश की टिप्पणी है- ‘बिसू की मौत हमारे जीने पर एक प्रश्न चिन्ह है।’ लेकिन, लेखिका की नजर में आशा पूरी तरह मरी नहीं है। यह आशा है ‘खतरनाक सम्मोहन भरी दुर्निवार उस लपकती अग्नि लीक में जो बिसू और बिन्दा तक रूकी नहीं रहती।’ उपन्यास के आखिरी दृश्य में सक्सेना को अन्याय के प्रतिरोधी बिन्दा की जगह लेते दिखाकर लेखिका ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी आस्था अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अन्यायी व्यवस्था के बदलने की उम्मीदें बरकरार हैं। 

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